क्रान्ति का अर्थ होता है व्यवस्था में आमूलचूल परिर्वतन । नवपाषाण काल मानव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है, इस काल में मानव ने कृषि करना, पत्थर के धारदार तथा नुकीले और सुक्ष्माकार के उपकरण व हथियार बनाना सीख गया था, साथ ही कताई- बुनाई, कुम्भकारी, भवन-निर्माण (मिट्टी व घासफूस के) का कौशल विकसित कर लिया था, मिट्टी के बर्तन तथा हथियार कलात्मक होने लगे थे साथ ही साथ ये पशुपालन भी करते थे और पालतु जानवर भी रखते थे जैसा कि बुर्जा होम से मानव के साथ कुत्ते के शवाधान का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
फिर भी नवपाषाण काल को एक सम्पूर्ण क्रान्ति की संज्ञा देना सही नहीं होगा, यदि हथियार, अन्य उपकरण प्रौद्योगिकी को हटा दे तो मानव अन्य क्षेत्रों में उतनी सशक्त स्थिति में मौजूद नहीं दिखता क्योंकि न तो वह खद्योत्पादन में तकनीक का प्रयोग जानता था नहीं कृषि अधिशेष से अवगत रहा साथ ही वह अभी भी केवल पत्थर व हाडियों के औजारों पर आश्रित था तथा पहाड़ियों के ढलानों, गुफाओं, नदी-घाटियों में ही अपना निवास बना सका जिसके कुछ महत्वपूर्ण स्थल जहां नवपाषणिक संस्कृति उपस्थित रही है, मेहरगढ़, बुर्जाहोम, गुफ्फकरल, बेलन घाटी का कोलडिहवा, महागरा, चोपानी, मांडो, मध्यपूर्व का चिरांद, चेंचर ,सेनुआर तथा पूर्वोत्तर का तारादिव, प्रायद्वीपीय भारत में मस्की, ब्रह्मगिरि महत्वपूर्ण है।
नवपाषाणिक काल के कुछ (अन्य) महत्वपूर्ण क्षेत्र आने वाले समय तक महत्वपूर्ण रहे थे, इस प्रकार हम नवपाषाण काल को सीमित क्रांति या आने वाली क्रांति की संज्ञा दे सकते हैं, जैसा कि वी. जी. चाइल्ड ने कहा है कि, "नवपाषाण काल एक आत्मनिर्भर, खाद्योत्पादक अर्थव्यवस्था थी।" इस प्रकार नवपाषाण काल एक क्रान्ति न होकर मानव विकास की प्रक्रिया थी।