राष्ट्रवाद-NATIONLISM

वर्तमान विश्व में प्रत्येक राष्ट्र की राजनैतिक विचारधारा अतिराष्ट्रवाद से अत्यधिक प्रेरित है।
आइये समझते है इसेः-
राजनैतिक सिद्धान्तों के अनुसार राज्य भौतिक व राजनैतिक पक्षों का समन्वय है जिसमें निश्चित जनसंख्या निश्चित भ्ूा-क्षेत्र तथा सरकार व संप्रभुता का होना आवश्यक माना जाता है तथा सह एक मूर्त इकाई होती है। स्पष्ट है कि राज्य के लिए भौगोलिक सीमाओं का होना महत्वपूर्ण है।।
राज्य की संकल्पना के विपरित राष्ट्र को सामान्यतः एक अमूर्त इकाई माना गया है, जिसमें भावना का पक्ष प्रधान होता है। ऐसी विचारधारा जो लोगों को एकता के सुत्र में बांध सके, उनके बीच अपनत्व का भाव पैदा कर सके तथा साझा हितो की भावना स्थापित कर सके, जिसके आधार पर हम किसी भी विरोधी से टकराने को तैयार हो जाएं, ऐसी जागरूकता ही राष्ट्रवाद कहलाती है।
ऐसे विचारांे की उत्पत्ति का आधार धर्म संस्कृति रिती रिवाज भाषा अथवा शोषण के विरूद्ध चेतना कुछ भी हो सकता है। इसीलिए राष्ट्रवाद के भिन्न रूप दिखाई देते है-
1.आर्थिक राष्ट्रवाद
2.सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
3.धार्मिक राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद की उत्पत्ति व विकास एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में रहा है, जैसे-जैसे औपनिवेशिक शासन अपने दीर्घकालिक दौर से गुजरता गया शोषण की प्रकिया बदलती गई ,वैसे-वैसे भरतीय राष्ट्रवाद भी परिपक्व होता गया। स्पष्टतः भारतीय राष्ट्रवाद कोई घटना न होकर एक गतिशील प्रक्रिया रही है। लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता व औपनिवेशिक शासन पद्धति के चरित्र की जानकारी होती गई और हमारा राष्ट्रवाद मजबूत होता गया।
सामान्यतः राष्ट्रवाद की परिभाषा को व्याख्यायित करते हुए हम आधुनिक युरोपीय मानको की तलाश करते है इसीलिए राष्ट्रवाद को एक आधुनिक संकल्पना के रूप में भी देखा जाता है। भारतीय इतिहास में इसका विश्लेषण औपनिवेशिक शासन के दौरान ही किया जाना महत्वपूर्ण माना गया है, 1857 के महाविद्रोह के बाद क्रमिक रूप के भारतीय राष्ट्रवाद विकसित होता गया और 1940 के दशक में यह अपने चरम पर पहुंच गया जब प्रत्येक भारतीय आजादी के लिए अपनी सक्रिय भूमिका दर्ज कराने हेतु तत्पर था। आजादी के बाद राष्ट्रवाद पुनः नये आयामों को धारण करने लगा और 21वीं सदी में इसका स्वरूप पुनः समय व परिस्थितियों के अनुसार बदल चुका है जिसमें राष्ट्र का सर्वांगीण विकास और उसमें अपनी भूमिका वर्तमान राष्ट्रवाद की पहचान है।
भारत में राष्ट्रवाद की उत्पत्ति को उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धान्त से भी विश्लेषित किया जाता है जिसके अनुसार अपनी औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेजो ने जिस तरह की नीतियों, प्रक्रियाओं व अवसंरचनाओं की स्थापना भारत में की उसी पर अनुक्रिया कर भारतीय राष्ट्रवाद विकसित होता गया।
इतिहासकारो ने भारतीय राष्ट्रवाद की उत्पत्ति के बारे में प्रमुखतः दो भागों में विचार व्यक्त किए-
1.प्रथम मत भारतीय राष्ट्रवाद की उत्पत्ति के लिए और भारत को एक राष्ट्र बनाने के लिए ब्रिटिश सत्ता को प्रमुख कारक मानता है और इसके अनुसार भारत के लिए ब्रिटिश सत्ता वरदान की तरह थी, इस वर्ग में साम्राज्यवादी इतिहासकार प्रमुख है जैसे- कुपलैण्ड।
2.द्वितीय मत उन इतिहासकारों का है जो राष्ट्रवाद की उत्पत्ति में औपनिवेशिक शासन को महत्व न देकर इसे स्वदेशी चेतना से जोड़ते है और सामान्यतः अंग्रेजो को नकारात्मक रूप से विश्लेषित करता है।
कुल मिलाकर देखा जाय तो राष्ट्रवाद के लिए औपनिवेशिक शासन व स्वदेशी प्रेरणा दोनों ही उत्तरदायी रही है, अंग्रेजो द्वारा स्थापित मुल्यों, नीतियों, प्रक्रियाओं व अवसंरचनाओं आदि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसीलिए कहा जाता है कि ‘‘भारत ने अपनी गुलामी की जंजीरों को पश्चिमी हथौड़े से तोड़ डाला’’।
भारतीय राष्ट्रवाद की उत्पत्ति व विकास प्रक्रिया/कारकः-
शोषणकारी औपनिवेशिक सत्ता की उपस्थिति
लिटन व कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतिः-
भारतीयों द्वारा अपने अधिकारो की मांग और शासन प्रशासन में अपनी भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ रही थी तो लिटन व कर्जन जैसे वायसरायांे ने ताकत के बल पर इसे कुचलने का प्रयास किया। लिटन ने भारतीय राष्ट्रवाद को कुचलने के लिए वर्नाकुलर प्रेस एक्ट तो कर्जन ने प्रशासन का अति केन्द्रिकरण व फुटडालो व राज करो से अभिभूत होकर बंगाल विभाजन का निर्णय लिया जिससे भारतीय राष्ट्रवाद कमजोर होने की जगह पर और प्रखर हो उठा।
तीव्र यातायात व परिवहन का विकास (रेल परिवहन)
प्रशासनिक व आर्थिक एकीकरण
प्रेस व साहित्य की भूमिका
अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव
भारत के गौरवमयी अतीत की खोज व सामाजिक, धार्मिक सुधार आन्दोलन
आधुनिक शिक्षा पद्धति व भारत में नव मध्यम वर्ग(अंग्रेजी शिक्षा आधारित रोजगार से जुड़ा)का उदय
अंग्रेजो ने औपनिवेशिक शासन प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली को भारत में अपनाया जिसके अन्र्तगत गणित, अभियांत्रिकी जैसे विषयों के साथ ही राजनैतिक सिद्धान्त व दर्शनशास्त्र जैसे विषय शामिल किए गए। इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य यद्यपि भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाना व कम खर्च मे अधीनस्थ कर्मचारी प्राप्त करना था किन्तु इस शिक्षा के कारण भारतीयों को समकालिक विश्व का बेहतर ज्ञान हो सका और मुख्यतः युरोप से जब इन्होने अपनी तुलना की तो यह महसुस हो गया की एक देश के नागरिक होने के नाते कुछ प्रमुख अधिकार होते है जिसको औपनिवेशिक शासन ने उपलब्ध नहीं कराया।
इस शिक्षा ने भारत में एक नए मध्यम वर्ग को पैदा किया जो अन्य वर्गो से अधिक जागरूक था, शिक्षा आधारित रोजगार से जुड़ा था और अपने अधिकारों के प्रति संवेदनशील था इस वर्ग ने जब मिल व बैंथम को पढ़ा, ग्लैंडस्टोन जैसे सांसदो की चर्चाएं सुनी तथा आयरलैण्ड व स्कॉटलैण्ड जैसे देशों की व्यवस्था से भारत की तुलना की तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे की दुनिया में विख्यात ब्रिटिश शासन लोकतन्त्र, न्याय व मानवाधिकारों के लिए भले ही जाना जाता हो किन्तु भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है इसीलिए नौरोजी ने औपनिवेशिक शासन प्रणाली को ‘‘अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया’’ कहा। आधुनिक शिक्षा से युक्त यह नव मध्यम वर्ग को यह भी एहसास था कि अपने अधिकारों की मांग के लिए उन्हें आवाज उठानी होगी और इसके लिए जनमत व संगठन की आवश्यकता होगी, यही जागरुकता अखिल भारतीय राष्ट्रवाद के विकास का प्रमुख कारण बना।....to be continue