भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष एक ऐसे ऐतिहासिक संघर्ष का परियाय है जिसे सम्पूर्ण विश्व कैतुहल की दृष्टि से देखता है क्योकि यह विभिन्न देशों की आजादी का प्रेरणा बना। ऐसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संघर्ष के स्वरूप को समझने के लिए हमे दो मुख्य प्रश्नो का उत्तर देना होगा-

  • क्या राष्ट्रीय संघर्ष विभिन्न संघर्षो का योग मात्र था या फिर एक दीर्घकालिक प्रक्रिया
  • हमारे राष्ट्रीय संघर्ष की रणनीति

        साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने इसे अलग-अलग होने वाला संघर्ष माना तो राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इसे सतत प्रक्रिया माना है। यह प्रश्न इसलिए भी जटिल हो जाता है क्योंकि हमारे नेताआंे ने समग्र राष्ट्रीय संघर्ष की रणनीति पर चर्चा या राष्ट्रीय संघर्ष के स्वरूप के बारे में लेख नहीं लिखा बल्कि संस्कृतिक व दार्शनिक आयामांे की चर्चा की अतः स्पष्ट लेखन का अभाव है।

राष्ट्रीय संघर्ष के स्वरूप को समझना इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि भारत में उपस्थित औपनिवेशिक शासन प्रणाली रूस के ‘‘जार्ज’’ की तरह या जर्मनी के ‘‘हिटलर’’ की तरह निरंकुश प्रणाली नहीं थी बल्कि वैधानिक निरंकुश, संरक्षिक-संरक्षित रिश्ते पर आधारित अर्द्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था थी।

        राष्ट्रीय संघर्ष के स्वरूप व रणनीति को समझने के लिए ब्रिटिश शासन की नीतियों उनके प्रभावों व उनके बिरुद्ध भारतीय प्रक्रिया को समझना होगा और अंग्रेजो ने जिस तरह भारतीयों के मन में ‘‘व्हाइट मैन बर्डेनसिप’’ व यूरोप की अजेयता का मिथक स्थापित कर दिया था, वह कैसे टुटा इसे भी जानना आवश्यक है, जिसके लिए आइए इसको समझते हैं-

कांग्रेस की स्थापना से लेकर गांधीवादी आंदोलन को हम परिवर्तनीयता व निरन्तरता के दृष्टिकोण से विश्लेषित करंे और जब जब-2 राष्ट्रीय संघर्ष की आन्दोलनकारी प्रकृति धीमी हुई तो क्रान्तीकारिता का उभार, इस रूप में देखा जाये कि जन आन्दोलन व क्रंाति एक दुसरे के पुरक थे।

कांग्रेस ही नहीं बल्कि विभिन्न विचारधाराओं व संगठनो ने हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को समृद्ध किया अर्थात् हमारे राष्ट्रीय संघर्ष के विभिन्न वैचारिक आयाम थे जिसमे कुछ तो एक दूसरे से लड़ते हुए भी प्रतीत होते है किन्तु उनके आजादी का लक्ष्य एक बना।

जनता की भागीदारी भी हमारे राष्ट्रीय संघर्ष के स्वरूप का महत्वपूर्ण आयाम है, सीमाओं के बावजूद हमारा राष्ट्रीय संघर्ष विशेषतः गाधीवादी आन्दोलनों से जन आधारित संघर्ष का रूप धारण करता गया और 1942 के बाद तो स्वतः स्फूर्तता हमारे राष्ट्रीय संघर्ष की पहचान बन गई।

उदारवादीयों की आर्थिक मीमांसा ने अंग्रेजों की ‘‘व्हाइट मैन वर्डेनसीप’’ का पर्दाफाश कर दिया तो राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय घटनाओं ने क्रमशः सविनय अवज्ञा आंदोलन कर लोगों के मन मस्तिष्क से अंग्रेजो के भय को दूर कर दिया।

        अतः जिस तरह उदारवाद, उग्रवाद व गांधीवाद अलग-2 न होकर एक स्वाभाविक विकास की कड़ी से जुडे थे उसी तरह  निश्चित दस्तावेजांे के न होने के बावजूद हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को निरन्तर व दीर्घकालिक प्रक्रिया मानना तार्किक होगा जो विभिन्न वैचारिक आन्दोलनों से गुजरते हुए जन आन्दोलन बना और हमें स्वतन्त्रता के सोपान तक पहुंचाया।

कांग्रेस की स्थापना से जुड़ा विवादः-

       सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलन की चेतना की गर्भ से राष्ट्रवादी प्रक्रिया को गति मिली और 1857 के महाविद्रो ने यह सिद्ध कर दिया की अधिकांश भारतीय जनता बिटिश सत्ता से असंतुष्ट है इसी क्रम में औपनिवेशिक सत्ता विरुद्ध भारतीय राष्ट्रवाद का क्रमशः विकास होता गया और उसी ने सांगठनीक प्रेरणा के रूप में भारतीय कांग्रेस की स्थापना को जन्म दिया। 1885 में स्थापित कांग्रेस जो भारतीय राष्ट्रवाद का पर्याय और हमारे स्वतन्त्रता संग्राम की पहचान बनी, जैसे महत्वपूर्ण संगठन के बारे में कई आलोचनाओ ने भी जन्म लिया जिसमें सबसे प्रमुख व लोकप्रिय आलोचना सुरक्षा कपाट का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त को उग्रवादी विचारधारा के समर्थक लाला लाजपत राय, माक्र्सवादी आर0पी0 दत्ता व आर0एस0एस0 गुरू गोलवरकर ने लोकप्रियता प्रदान की।

  • सुरक्षा कपाट का सिद्धान्त (sefty wall theory)ः-

        इस सिद्धात के अनुसार कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजो ने जानबुझकर कराई और कांग्रेस की स्थापना का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश वायसराय के निर्देशन में ब्रिटिश सत्ता को भारतीय असंतोष से बचाना था।

        उल्लेखनीय है कि sefty wall वह युक्ति होती है जो किसी तन्त्र से जुड़कर उसपर पड़ने वाले दबावों जो अवमुक्त कर देती है जिससे की वह तन्त्र सुरक्षित रहता है। इसी सन्दर्भ में भारतीयों के असंतोष रूपी दबाव से ब्रिटिश सत्ता को बचाने के लिए कांग्रेस की स्थापना की गये। इसे सरकारी षणयंत्र का सिद्धान्त भी कहतेे है।

इस सिद्धान्त को निम्नलिखित तर्कों के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया जाता हैः-


काग्रेस का संस्थापक A.O.Hume (कृषि विभाग के सचिव) न सिर्फ यूरोपीय थे बल्कि वरिष्ठ सिविल सेवक भी थे।

विलियम बेडरबर्न ने ह्युम की जीवनी नामक पुस्तक में यह उल्लेख किया है कि कांग्रेस की स्थापना वायसराय डफरिन के निर्देशन में कि गई और कांग्रेस के अन्य अध्यक्ष W.C.Benerjee ने सार्वजनिक सभा में इसी बात का उल्लेख किया है।

कांग्रेस की आरम्भिक मांगे, कार्यक्रम व रणनीति भी कोई महत्वपूर्ण बदलाव की मांग करती नही दिखती और प्रारम्भिक काग्रेंस का रवैया सरकार के साथ सहयोगी जैसा दिखता है।


क्या यह कहा जा सकता है कि भारतीय कांग्रेस की स्थापना अखिल भारतीय स्तर पर आन्दोलन के लिए आवश्यक थी? 

A.O.Hume यूरोपीय व सिविल सेवक होने के साथ ही एक मानवतावादी व्यक्तित्व थे जो भारतीयों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील थे और कांग्रेस स्थापना से पहले ही उन्होने सलाह दी थी कि भारतीयों को अपनी मांग रखने के लिए एकजुट होना  पड़ेगा अतः ह्यूम का यूरोपीय होना उनके व्यक्तिव को कांग्रेस के सन्दर्भ में संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।

वस्तुतः कांग्रेस की स्थापना को कोई घटना या अचानक स्थापित होनेे वाली संस्था के रूप में देखना ही गलत है क्योकि इसकी स्थापना तो भारत में उत्पन्न राष्ट्रवादी चेतना के विकसित व संगठित रूप धारण करने से जुड़ी है, स्मरणीय है कि भारत में 1830 के दशक में (स्थापित) अपनी मांगो को रखने के लिए, अपने हितो की रक्षा के लिए संगठन निर्माण की शुरुआत हुई। यद्यपि प्रारम्भ में जमीदारों ने अपने स्वार्थो की रक्षा के लिए संगठन बनाया किन्तु 1870 का दशक आते-2 संस्थाओं का निर्माण व नेतृत्व मध्यम वर्ग के हाथांे में आ गया और संगठन/संस्था की स्थापना गति पकड़ने लगी। 

पूना सार्वजनिक सभा ने लंदन में अपने प्रतिनिधि को भेजकर ब्रिटिश संसद के समक्ष यह मांग रखी की भारतीय शासन के      संचालन में भारतीयों की भूमिका बढ़ाई जाये इसी तरह नौरोजी, रानाडे, गोखले, मेहता, एस0बनर्जी जैसे जागरूक भारतीय अब भारतीय राष्ट्रवाद का नेतृत्व करने लगे और 1876 में इण्डियन एशोसिएशन की स्थापना हुई।

1883 में यह निर्णय लिया गया कि अब प्रतिवर्ष राष्ट्रीय सम्मेलनांे का आयोजन होगा अर्थात् एक अखिल भारतीय स्तर पर एक वृहद मंच की आवश्यकता की परिस्थितियां उभरने लगी थी और 1885 में कांग्रेस की स्थापना ने इसी आवश्यकता को पूरा किया।

प्रारम्भ की कांग्रेस की मांगे देखने में भले ही उदार हो किन्तु वह एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय आन्दोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी, क्योकि यदि आरम्भ में ही अतिवादी या क्रान्तिकारी मांगे रखी जाती तो सम्भवतः कांग्रेस नामक आन्दोलन वयस्क होने से पहले ही कुचल दिया जाता।


आरम्भिक कांग्रेस (उदारवादी) के नेतृत्व का स्वरूपः-

1885 में स्थापित कांग्रेस का नेतृत्व प्रथम २ दशकों तक उदारवादीयों के हाथो में रहा, आधुनिक शिक्षा प्राप्त यह वर्ग ब्रिटिश मूल्यों के प्रति अटुट आस्था रखता था और ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखता था, स्पष्ट है कि ब्रिटिश मूल्यांे के प्रति इस नेतृत्व को पूर्ण विश्वास था कि आधुनिकीकरण के लिए ब्रिटिश सत्ता का यहां बने रहना आवश्यक है अर्थात् कांग्रेस का आरम्भिक नेतृत्व शिक्षित नया मध्यम वर्ग से प्रभावित था।

कांग्रेस के स्थापना अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था जिसमे से अधिकांश वकील व पत्रकार थे और सामान्यतः कांग्रेस पर इस वर्ग का प्रभुत्व हमेशा बना रहा। प्रारम्भिक कांग्रेस के नेतृत्व के स्वरूप की विशिष्टता उसकी धर्मनिरपेक्षता थी। आरम्भिक अधिवेशनों से ही ईसाई, पारसी, मुस्लिम, युरोपीय व हिन्दू वर्ग के अध्यक्ष बनाएं गए क्योंकि आरम्भिक कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को एक महत्वपूर्ण अवयव माना।

महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी कांग्रेस संवेदनशील थी और तत्कालिन सामाजिक रुढ़ीवादी परिस्थितियों में जब महिलाओं की महत्वपूर्ण राजनैतिक भूमिका को स्वीकारा नही जाता था तब भी कलकत्ता विश्वविद्यालय की पहली महिला स्नातक कादम्बीनी गांगुली को उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया गया। 1917 में कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष एनी बेसेन्ट के चयन ने कांग्रेस की महिलाओं की भागीदारी के प्रति नजरिया को स्पष्ट कर दिया।

प्रारम्भिक कांग्रेस के नेतृत्वकर्ताआंे को यह भी ज्ञात था कि राष्ट्रवाद को प्रसारित करना प्राथमिक आवश्यकता है अतः यह निर्णय लिया गया कि कांग्रेस अधिवेशन प्रतिवर्ष देश के विभिन्न क्षेत्रांे में आयोजित होगें।

        यद्यपि प्रारम्भिक नेतृत्व आम जनता या गांवों तक नहीं पँहुच सका और मुख्यतः शहरी मध्यम वर्ग तक ही अपने आप को सिमित रखा। कांग्रेस के प्रारम्भिक अधिवेशनों में अंग्रेजी बोलने और ब्रिटिश मूल्यांे के प्रति विश्वास व्यक्त  करने पर अधिक बल दिया गया इसीलिए तिलक जैसे उग्रवदी विचारधारा के नेता ने इनके सम्मेलनांे को तीन दिवसीय तमाशा कहा परन्तु इन आलोचनाओं के बावजूद भारतीय राष्ट्रवाद की संगठित नीवं रखने में उदारवाद की भूमिका प्रशंसनीय है।