प्रकृति का प्रतिस्नेह निराला, 

स्वाद निराला मोह निराला, 

प्रतिहारी सा खड़ा शरद ये, 

है किसान के हल का फाला ।।


शिशिर ऋतु सा मुख है उसका, 

है बसंत के लिए वो काला, 

रुदन सा मुख लिए खड़ा वो, 

जैसे कोई दुःख हो पाला, 

लेकिन उसका स्नेह निराला। 

स्वाद निराला मोह निराला ।।

.....................................

.....................................

प्रायण करता ये बनवासी, 

छोड़ अयोध्या पहुचें काशी, 

लिए कमण्डल हाथ में भाला, 

जयकारे में हैं नंदलाला, 

प्रकृति का प्रतिस्नेह निराला। 

स्वाद निराला मोह निराला ।।