महासमर


संघर्षों के इस महासमर में ,

हम नितदिन कर्मो के बीज बोते हैं,

फसल भी एक दिन लहराएगा,

कुछ न कुछ फल दे जाएगा,

इस बात में बस हम खोते हैं ,

और एक मुस्कान में रोते हैं,

सब दुखों को ऐसे पिरोते  हैं,

की पल भर में सब होते हैं,

और पल भर में सब खोते हैं,

एक पल का सुकून पाने को ,

हर पल का सुकून खोते हैं,

है नहीं कुछ और खोने को,

फिर भी पाने  से डरते हैं,

चेहरे पर मुस्कान लिए ,

उम्मीदो  के सूरज ढलते हैं,

की कब आएगी रितु हमारी,

कब फसल पककर तैयार होगा,

कब हम फलों का स्वाद लेंगे,

कब हमारा जीवन निसार होगा,

बस इसी उलझन में रहते हैं,

और नितदिन कर्म करते हैं,

अब तो देखो फसलों को हम,

अपनी रक्त से भरते  हैं,

फल चाहे अब जो भी हो,

हम तो बस कर्म करते हैं,

संघर्षों के इस महासमर में,

हम नित दिन सूर्य सा जलते हैं।