दूर तक जो बहे वही भाव हूँ,
जो न टूटे ना थके वही नाव हूँ,
खुद से करूँ प्रेम वो पूछे क्यूँ, कहा,
जिंदगी ने दिए दर्द वही घाव हूँ।।
खींच लूँगा तुम्हें वही पतवार हूँ,
बह चलूँ साथ तेरे वही धार हूँ,
गीत लिख दूँ कि गर नाम से अपने,
मै कवि फिर कहाँ, केवल पुकार हूँ,
दूर तक जो बहे वही भाव हूँ ।।
सीन वो भी गर ठहरा है साथ मेरे,
संभल कर जो चला वही चाल हूँ,
किस्मत को अंजाम देने की खातिर,
उसके हाथों में उलझी रेख जाल हूँ,
दूर तक जो बहे वही भाव हूँ।।
सोम से जो मिला पूर्णिमा की वो रात,
और लेकर बही चांदनी संग हवा,
आए कोई अमावस कि डर तू गया,
मै अमावस को निगलू वही काल हूँ,
दूर तक जो बहे वही भाव हूँ ।।
सत्य, दूर तक जो बहे वही भाव हूँ।
जो न टूटे ना थके वही नाव हूँ।।
गीत ऐसा नहीं कि बादल बरस जाए,
उनके समझ जो आए वही ताल हूँ,
मृदंग कि थपक, बांसुरी की वो धुन,
खींच कर भी ठहर जाए वो झाल हूँ,
दूर तक जो बहे मै वही भाव हूँ।।
घेर लेगा अगर हिन्द भी धार से,
बन के शारथ तेरा सिद्ध सा आउंगा,
पीकर इस जलधी को सोख मै जाऊँगा,
उस जलधी के लिए मै वही काल हूँ,
दूर तक जो बहे मै वही भाव हूँ।