तू चल अकेला इस राह पर, 

बन स्वयं का तू गुरु, 

दे स्वयं दीक्षा स्वयं को,

बन जा सुदर्शन चक्र तू।

काट मस्तक अधर्म का, 

खींच कर गाण्डीव की डोरी, 

छोड़ तु ब्रह्मास्त्र अब, 

है यहाँ अमोघ चोरी ।।

देख कर्ण संग पाप कर, 

ताप इंद्र का कम हुआ, 

देकर मिथ्य वाक उसको, 

ले लिया ब्रह्मांड सारा ।।

कर से कर को जोड़, 

मस्तकों को तोड़, 

ना ले प्रतिज्ञा भीष्म तू, 

भीष्म भी छल से ही हारा।। 

द्वेष भारी पड़ रहा, 

बह रहा है रक्त सारा, 

प्यार की दो बूँदो से, 

मानवों को सींच, 

पथ का कर निर्माण तू, 

ले कर्म का आकार तू, 

जिस रूप से हो राष्ट्र धन्य, 

उस राह को साकार कर, 

छोड़ तू फूलों की माला, 

ताज़ वो काँटों का ओढ़, 

पी जा विष शंभू की भांति, 

अमृत जनों में बांट तू। 

चल अकेला इस राह पर, 

बन सुदर्शन चक्र तू ।।