"बुढ़ापे की महत्वाकांक्षा"
अजीब वक़्त था वो... की जब हम माघ की ठिठुरन से भी लड़ पड़ते थे... फ़क़त एक प्याली चाय के लिए।
की जब दिन को रात, और रात को दिन समझना हमारी ज़िद हुआ करती थी।
की जब हम दोनों के हाथ, एक दूसरे की आदत हुआ करते थे।
अजीब वक़्त था.....
की कभी जो हम बेवजह भी अलग-अलग नज़र आ जाएं, तो लोग यूँ देखते, की जैसे कोई अधूरा सपना देख लिया हो।
लेकिन देख ना!!!
अजीब वक़्त है ये भी.....
की अब एक प्याली चाय की गर्मी... माघ की ठिठुरन का हौसला बढ़ाने लगी है।
की अब दिन को दिन, और रात को रात समझना हमारी मजबूरी है।
की अब तेरे हाथ अधूरेपन के दस्ताने में कैद हैं... और मेरे... एक मनहूस छड़ी के सहारे बेजान रास्ते टटोलने में मशरूफ.....
अब तो आदत भी हो गई... लोगों को.... अधूरे सपने देखने की.....
न जाने कब से मैं इस तब... अब.... के बीच झूल रहा था.....
की मेरे भीतर मुस्कुराते तेरे वजूद ने... मेरे कान में बुद्बुदाकर कहा!!!!!
चाय के धुएं की खुशबुओं में लिपटी वो सर्द शामें फिर आएंगी।
हम फिर नहाएंगे उन्ही ओस की बूंदों में... जो आम की पत्तियों को छूती हुई महका जाएंगी हमें किसी हवनकुंड की तरह।
हम फिर भागेंगे एक साथ... उसी एक तितली के पीछे, जिसके दीदार भर को खड़े रहते थे... 6. से 8. उसकी चौखट पर।
किसी रोज़ तू दोबारा पकड़ेगा वो हाथ... जिसे कभी न छोड़ने की आदत थी तुझे।
मगर अब ये सिसकती कल्पनाएं हक़ीक़त का लिबास ओढ़ना चाहती हैं।
की अब हमें अपनी कल्पनाओं के हवनकुंड में कर्तव्यों की आहुति देनी होगी।
हमें सुलगानी पड़ेगी महत्त्वाकांक्षाओं की वो अगरबत्ती, जो सुगंधित करे हमारे ख्वाबों के घरौंदे को।
हमें छीननी पड़ेंगी अपने हिस्से की वो मुलायम सर्द शामें... इन कंटीली सर्दियों से।
निकालनी पड़ेगी मोहब्बत की दो प्याली चाय... नफरतों की केतली से।
की इस बार जो हम मिलें, तो एक दूसरे में अपना अक्स तलाशें... वजूद नहीं.....