किंचित मन, है तन भारी
चिंतित वाणी बात तुम्हारी
रूदन सा मुख लिए खड़ी वो
जैसे सब कुछ है वो हारी
रोज निकलती है सूरज सी
अठखेली करती बूँदों से
जब वो सुनकर भी न सुने
तो ढल जाती है शाम हमारी
किंचित मन, है तन भारी...
#satyendra tiwari
1 year ago
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किंचित मन, है तन भारी
चिंतित वाणी बात तुम्हारी
रूदन सा मुख लिए खड़ी वो
जैसे सब कुछ है वो हारी
रोज निकलती है सूरज सी
अठखेली करती बूँदों से
जब वो सुनकर भी न सुने
तो ढल जाती है शाम हमारी
किंचित मन, है तन भारी...
#satyendra tiwari