यह कहना अतिश्योक्ति न होगी की आजादी के बाद से २०वीं सदी के अन्त तक भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण धूरी सोवियत रूस के साथ उसके संबंध रहे है।. रूस द्वारा कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में वोटो पावर का प्रयोग कर इस संबंध की गहरी और मजबूत नींव डाली थी। परम्परागत रूप से भारत-रूस संबंधों के पांच महत्वपूर्ण घटक रहे है जिनमें प्रतिरक्षा असैनिक परमाणु ऊर्जा एवं आतंक विरोधी सहयोग प्रमुख रूप से रहे, अन्य घटक में राजनीति एवं अंतरिक्ष सहयोग रहे परंतु वर्तमान परिदृश्य में एक अन्य घटक आर्थिक सहयोग के रूप में उभरकर सामने आया है। भारत-रूस संबंध समय के साथ परिरक्षित है तथा सोवियन यूनियन के विघटन के बावजूद संबंधों पर कोर्ने नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु वर्तमान बहुध्रुवीय वैश्विक परिदृश्य में दोनों देश आर्थिक एवं सामरिक सहयोग हेतु नए मित्र तलाश रहे हैं।
चूंकि विदेश नीति एक गतिशील प्रक्रिया है। तथा समय-समय पर इसकी बदलते रहने की प्रवृत्ति है, यही प्रवृत्ति भारत और रूस संबंधों में भी देखने को मिली। आर्थिक तथा सामरिक कारणों से भारत का झुकाया अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोपीय देशों की ओर वर्तमान समय में अधिक रहा है। चीन के साथ बढ़ते तनाव तथा प्रति स्पर्धा के कारण भारत ने अमेरिका के साथ-साथ जापान, वियतनाम, मंगोलिया, फ्रांस तथा जर्मनी तथा अन्य देशों के साथ संबंधों को मजबूत किया है तथा पिछले वर्षों में इजराइल जैसे देशों से रक्षा संबंधों को और अधिक मजबूत किया है। इसके प्रत्युत्तर में रूस ने चीन तथा पाकिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करने को प्राथमिकता दी है। रूस ने पहली बार पाकिस्तान के साथ 'फ्रेंडशिप-2016' सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया है।
परन्तु रूस ने भारत को आश्वस्त किया है कि विवादित मुद्दों पर उसका रूख नहीं बदलेगा। भारत अब भी रूस से ही सबसे अधिक सैन्य सामग्री आयात करता है तथा वह असैन्य परमाणु एवं अंतरिक्ष क्षेत्र में भी भारत का सबसे बड़ा सहयोगी है। आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में भी दोनों देशों के पास असीम संभावनाएं है, भारत और रूस दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता है। वैश्विक पटल पर राष्ट्र भिन्न-2 हितों की पूर्ति हेतु विभिन्न देशों से संबंध स्थापित करते है. इस बात को दोनों देशों को समझना होगा तथा आपसी संबंधों को द्विपक्षीय एवं SCO एवं BRICS जैसे संगठनों के माध्यम से नई ऊंचाई तक पहुंचाने के प्रयास करने होगें।