भारत पिछले तीन दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता का प्रमुख दावेदार रहा है। आज भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या, पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, परमाणु शक्ति, प्रमुख शांति-स्थापना योगदानकर्ता तथा वैश्विक दक्षिण (Global South) की महत्वपूर्ण आवाज़ है। फिर भी स्थायी सदस्य बनने के लिए केवल योग्यता पर्याप्त नहीं है; इसके लिए व्यापक कूटनीतिक, कानूनी और राजनीतिक रणनीति आवश्यक है।

वर्तमान स्थिति- UNSC में कुल 15 सदस्य हैं—5 स्थायी (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) और 10 अस्थायी। स्थायी सदस्यों के पास वीटो (Veto) का अधिकार है। भारत 1950 से कई बार अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है, परन्तु स्थायी सदस्यता अभी तक प्राप्त नहीं हुई।

भारत के पक्ष में प्रमुख आधार- 

1-विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या और लोकतांत्रिक व्यवस्था।

2-वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी स्थान।

3-संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में 2.5 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों का योगदान।

4-हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक भूमिका।

5-जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर सक्रिय नेतृत्व।

स्थायी सदस्य बनने के प्रमुख उपाय:--

1. संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन:--सबसे आवश्यक कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 23 में संशोधन है। इसके लिए महासभा के दो-तिहाई (193 में कम से कम 129) देशों का समर्थन।

सभी पाँच स्थायी सदस्यों (P5) द्वारा अनुमोदन और राष्ट्रीय स्तर पर पुष्टि। यही सबसे कठिन कानूनी प्रक्रिया है।

2. G4 समूह को मजबूत करना-भारत, जापान, जर्मनी और ब्राज़ील मिलकर G4 समूह बनाते हैं। इन चारों देशों की संयुक्त रणनीति सुधार प्रस्ताव को अधिक प्रभावशाली बना सकती है। अफ्रीकी संघ के साथ सहमति बनाना भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अफ्रीका भी दो स्थायी सीटों की मांग करता है।

3. वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व-भारत को एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीपीय देशों के हितों का प्रतिनिधि बनकर समर्थन बढ़ाना होगा। विकास सहयोग, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता भारत की नैतिक स्वीकार्यता बढ़ाती है।

4. P5 देशों का समर्थन सुनिश्चित करना

देश                          स्थिति

अमेरिका        सार्वजनिक समर्थन

रूस                 स्पष्ट समर्थन

फ्रांस              प्रबल समर्थन

ब्रिटेन                समर्थन

चीन        सबसे बड़ी चुनौती; स्पष्ट समर्थन नहीं

वास्तविक बाधा मुख्यतः चीन की राजनीतिक सहमति है।

5. वीटो पर व्यावहारिक दृष्टिकोण- भारत प्रारम्भिक चरण में यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर सकता है कि नई स्थायी सीटों को कुछ वर्षों तक वीटो न मिले। इससे सुधार पर सहमति बनने की संभावना बढ़ सकती है।

प्रमुख बाधाएँ:-

1-चीन: क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा।

2-Uniting for Consensus (UfC): इटली, पाकिस्तान, अर्जेंटीना आदि देश नए स्थायी सदस्यों का विरोध करते हैं।

3-महासभा में सुधार के स्वरूप पर देशों के बीच मतभेद।

4-वीटो व्यवस्था में परिवर्तन को लेकर स्थायी सदस्यों की अनिच्छा।

भारत की दीर्घकालिक रणनीति:-

1--129+ देशों का स्थायी समर्थन गठित करना

2--महासभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के लिए व्यापक कूटनीतिक अभियान।

3--अफ्रीकी संघ के साथ साझा सुधार मॉडल

4--G4 और अफ्रीकी देशों की मांगों को एक मंच पर लाना।

5--P5 के साथ संतुलित संबंध--विशेष रूप से अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन का समर्थन बनाए रखते हुए चीन के साथ संवाद।

6--वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं में निवेश

7--जलवायु, स्वास्थ्य, डिजिटल अवसंरचना और शांति अभियानों में नेतृत्व से नैतिक वैधता मजबूत करना।

निष्कर्ष:-- भारत की स्थायी सदस्यता केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक और लोकतांत्रिक बनाने का विषय है। सफलता का मार्ग तीन स्तंभों पर आधारित है—कूटनीतिक बहुमत, चार्टर संशोधन और P5 की सर्वसम्मति। निकट भविष्य में सुधार कठिन अवश्य है, किन्तु भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका उसे सबसे मजबूत दावेदारों में बनाए रखती है।]