जब खुद से लड़ना सीख लिया,
पन्नों में खुद को लिख दिया,
जब सुनकर दिल की बातों को,
सबको प्यार का गीत दिया,
आँखे तू अब क्यों बहती हो।
क्यों ठौर-ठौर पर रोती हो ।।
यह दौर पुरातन रहा नहीं,
जब लोग पुरातन मिले नहीं,
विचलित होकर मत रहा करो,
अश्कों से बातें किया करो,
जैसे पलकें ये कहती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो।।
आए भूकंप जब दिल में कभी,
नज़रों में खुद को दो समेट,
लेकर विश्वास में खुद को यहां,
एक गीत तू क्यों न कहती हो,
क्यों खुद में उलझी रहती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो ।।
जो दौर चला है मतलब का,
सूरज को चाँद बताने का,
रह सावधान इन शब्दों से,
दुनिया के रंग बिरंगों से,
जैसे कोई चोट ये कहती हो,
तू मुझको भी क्यों सहती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो ।।
कंकड़ के जब इस जंगल में,
रहना ही लिखा है मंगल में,
फिर राहू के भय से क्यों तू डरे,
डर डर कर पतझड़ क्यों तू सहे,
बन स्वयं यहां तू अपना कृष्ण,
संजय की आँखें कहती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो ।।
अश्कों से तू क्यों न कहती हो,
रुके रहे कुछ देर अभी,
करना है बहुत कुछ यहां अभी,
जब थक कर आऊँगा सोने,
धरती के साथ समाउँगा,
उस दिन रोना, रो कर कहना,
अश्कों से बात हमारी ये,
गंगा सी बहो लेकर खुद को,
कहीं दूर चलो सागर तट पर,
जो काला मन हो बचा कहीं,
अंदर तक उसको साफ करो,
सागर के खारे पानी में,
अर्थों के अर्थ को माफ करो,
प्रश्नों के उत्तर में कहना,
जब हृदय हृदय से गुजरती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो ।।
क्यों 'सत्य' की बातें करती हो,
है झूठ व्याप्त चहुँओर यहाँ,
काले मन का है ज़ोर यहाँ,
चल छोड़ यहाँ के शब्दों को,
जिह्वा से जहर जो कहती हो,
आँखें तू अब क्यों बहती हो।
आँखें तू अब क्यों बहती हो ।।