न्यूनतम समर्थन मूल्य msp
प्रस्तावनाः-भारतीय कृषि विकास का एक प्रमुख उद्देश्य एक उपयुक्त कृषि कीमत नीति का निर्धारण करना रहा है। जिससे कृषि क्षेत्र को एक सक्षम व सर्वांगीण विकास की सीमा तक पहुचायां जा सके। भारत में कृषि कीमत नीति के अन्तर्गत न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा को 1965 में लक्ष्मीकांत झा समिति की सिफारिशों पर लागू किया गया। डैच् सरकार द्वारा दी जाने वाली एक कीमत होती है जिस पर किसान अपना माल बेंच सकते है। व्चमद डंतामज च्तपबम (व्डच्) के कम होने पर डैच् किसानों को सुरक्षा प्रदान करती है। यह वह न्यूनतम दाम है जिसे सरकार किसानों को गारंटी देती है कि उसकी फसल की कीमत इससे नीचे नहीं होगीण् इस प्रकार डैच् एक प्रकार से किसानों के लिए सामाजिक सुरक्षा के रूप में देखी जा सकती है।
डैच् की घोषणा फसल बुआई से पहले की जाती है ताकि किसान किसी फसल को बोने या नहीं बोने का निर्णय कर सकते है।
भारत में 22 कृषि फसलों पर डैच् की घोषणा की जा रहीं है जबकि वर्ष 2010 से गन्ने के लिए थ्त्च् (थ्ंपत ंदक तमउनदमतंजपवद चतपबम) की घोषणा की जा रही है। थ्त्च् भी क्रियात्मक रूप से डैच् की तरह कार्य करती है।
डैच् और थ्त्च् दोनों के बारे में सुझाव ब्।ब्च् (ब्वउउपेेपवद वद ंहतपबनसजनतंस बवेजे ंदक चतपबमे) द्वारा दिया जाता है लेकिन अन्तिम निर्णय ब्ब्म्। (ब्ंइपदमज बवउउपजजमम वद मबवदवउपब ंििंपते) द्वारा किया जाता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि डैच् की सुरक्षा भ्ंजपबनसजनतम तक विस्तृत नहीं होती है, हालांकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (च्डथ्ठल्) से इस समस्या को दूर किया गया है।
वर्ष 2015 में भारत सरकार द्वारा भ्ंजपबनसजनतम के लिए च्ैथ्.च्तपबम ेजंइपसपेंजपवद निदक लाया गया लेकिन यह अभी तक आलु और प्याज तक ही विस्तृत है। इसके अलावा, इसमें किसानों को सरकारी हस्तक्षेप से संबंधित कीमतों के बारें में अग्रिम रूप से पता नहीं लग पाता है।
msp का निर्धारण किस प्रकार किया जाता
भारत में msp के बारे में ब्।ब्च् द्वारा सुझाव देते समय ब्2 लागत सिद्धान्त को ध्यान में रखा जाता है। इसके अन्तर्गत उत्पादन की लागतों पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है। लागतों के अन्तर्गत निम्नों को सम्मिलित किया जाता है-
ऽ वस्तु या नकद में दी जाने वाली सभी लागतें।
ऽ भूमि का लगान
ऽ पारिवारिक श्रम के लिए अनुमानित मजदूरी
ऽ स्वयं की पूंजी पर अनुमानित ब्याज
यह ध्यान देने योग्य है कि ब्।ब्च् यद्यपि लागतों को मुख्य स्थान देता है लेकिन वह कुछ अन्य बातों पर भी विचार करता है जैसे कि-
ऽ घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में कीमत प्रवृत्तियों और उनमें पाये जाने वाले अन्तर
ऽ प्दजमत.बतवच चतपबम चंतपजल (अन्तर्फसल कीमत साम्यता)
ऽ उपभोक्तामों के हित आदि।
डैच् की नीति में बदलावों को लेकर चर्चा
भारत में डैच् की सरकारी नीति में बदलावों के लिए लम्बे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही है। हनुमंतराम समिति (1990) के अनुसार डैच् के निर्धारण में ब्2 के स्थान पर ब्3 को लागू किया जाना चाहिए, इस संदर्भ में समिति का यह कहना था कि किसान को प्रबंधकीय योगदान के लिए का ब्2 का 10ः अतिरिक्त रूप से दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय किसान आयोग-2004(स्वामीनाथन आयोग) के अनुसार डैच् का निर्धारण ब्2 की तुलना में 50ः ऊपर किया जाना चाहिए।
डैच् के मुद्दे पर गठित की गई रमेश चन्द्रा समिति (2013) के अनुसार ब्2 के अन्तर्गत मुख्य किसान के लिए मजदूरी कुशल श्रम के लिए मजदूरी के अनुसार होना चाहिए।
भारत में कई बार डैच् के निर्धारण में राजनीति को ध्यान में रखा जाता है जिसके करण कुछ विशेष फसलों के मामले में ब्2 की तुलना में डैच् को काफी ऊंचा निर्धारित कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए 2006-07 से लेकर 2011-12 तक की समयावधि में गेहूं की डैच् को ब्2 की तुलना में 29 से 66ः तक ऊंचा रखा गया इसी प्रकार इसी समयावधि में चावल की डैच् को ब्2 की तुलना में 14 से 60ः तक ऊंचा रखा गया है। स्पष्ट है कि इतने बड़े अन्तर की समुचित आर्थिक व्याख्या नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त के अलावा, कई राज्य सरकारों (जैसे मध्य प्रदेश) द्वारा इन फसलों पर केन्द्र सरकार द्वारा घोषित की जाने वाली डैच् पर अतिरिक्त रूप से बोनस दिया जा रहा है जिसके करण यह अन्तर और अधिक होता जा रहा है इससे अन्तर्फसल कीमत साम्यता प्रभावित हो रही है।
केन्द्र सरकार के लिए सब्सिडी का भार बढ़ रहा है। थ्ब्प् के लिए भण्डारण संबंधित कठिनाई उत्पन्न हो रही है। दालों, मोटे अनाज, तिलहन आदि के उत्पादन पर विपरित प्रभाव भी पड़ रहा है।
भारत में यह भी देखा गया है कि सभी किसानों को डैच् के बारे में जानकारी नहीं है। छैैव् के एक अध्ययन के अनुसार केवल 40ः किसान डैच् की जानकरी रखते है तथा लगभग 16ः किसान डैच् पर अपना माल बेंचते हैं।
उपर्युक्त विश्लेषण के प्रकाश में भारत में डैच् की सरकारी नीति में आवश्यक बदलावों की संभावनाओं को स्वीकार्य किया जा सकता है।
रमेश चन्द्रा समिति(2013)
सम्पूर्ण भारत में थ्ब्प् द्वारा डैच् के आधार पर फसलों का भौतिक रूप से अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है इसीलिए भारत में क्च्च् क्मििपबपमदबल चतपबम चंलउमदज अथवा च्प् चतपबम पदेनतंदबम को लागू किया जा सकता है।
इस व्यवस्था में डैच् की घोषणा तो की जाती है लेकिन फसलों का अधिग्रहण नहीं किया जाता है, किसान खुले बाजार में व्डच् पर अपना माल बेचते हैं। यदि व्डच् डैच् की तुलना में कम है तो अन्तर के अनुसार सरकार द्वारा किसानों के बैंक खातों में ब्ंेी जतंदेमित कर दिया जाता है। इस प्रकार की प्रणालिया विकसित राष्ट्रों में अधिक प्रचलन में है। वर्ष 2015 में वर्धा जिले में कपास के लिए इस व्यवस्था को लागू किया गया था, इसके अच्छे परिणाम रहें हैं।
ब्।ब्च् द्वारा लागतों का मूल्यांकन करने के लिए एक ब्लॉक से एक गांव लेने के बजाय दो गांवों का चयन किया जाना चाहिए।
भूमि पर लगान की मात्रा वास्तविक रूप में प्रचलित लगान के बराबर होनी चाहिए।
किसान परिवार के मुखिया की मजदूरी कुशल श्रम की मजदूरी के अनुसार होनी चाहिए।
ब्।ब्च् को कृषि नीतियों के निर्माण में भूमिका दी जानी चाहिए तथा उसक नाम बदल कर ब्वउउपेेपवद वद ंहतपबनसजनतंस बवेजे चतपबमे ंदक चवसपबल कर देना चाहिए।
डैच् के सकारात्मक प्रभाव
( डैच् के करण भी मुद्रास्फिति प्रभावित होती है- रघुराम राजन पूर्व गवर्नर भारतीय रिजर्व बैंक)
डैच् से किसानों में कृषि की नई तकनीकी को लोकप्रिय बनाने में मदद मिली है।
डैच् को सामाजिक न्याय के एक कदम के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि इसके माध्यम से कृषि क्षेत्र को आय का हस्तांतरण होता है।
डैच् के माध्यम से कृषि की ज्व्ज् जमतउे व िजतंकम (व्यापार शर्ते) को उच्च स्तर पर बनाये रखने में मदद मिलती है। कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देने में ज्व्ज् की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कृषि वस्तुओं की अन्य वस्तुओं की तुलना में सापेक्षिक कीमत (तमसंजपअम चतपबम) को कृषि की ज्व्ज् कहते हैं।
यदि अन्य वस्तुओं की तुलना में कृषि वस्तुओं की कीमतें बढ़ती है तो इससे कृषि क्षेत्र को विशुद्ध रूप में लाभ प्राप्त होगा।
कृषि की ज्व्ज् को ऊपर ले जाने में डैच् की निर्णायक भूमिका हो सकती है।
डैच् के माध्यम से देश के ब्तवचचपदह चंजजमतद को वांछित दिशा में बदला जा सकता है जैसा कि भारत में गेहूं व चावल के मामले में देखने कम मिलता है।
वर्तमान में भारत सरकार अन्य बातों के अलावा डैच् के माध्यम से दालों के पक्ष में ब्तवचचपदह चंजजमतद को बदलने की कोशिश कर रही है।
डैच् के माध्यम से भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मपूर्णता (ेमस िेनििपबपमदबल) की स्थिति को प्राप्त कर पाया है।
वर्तमान में भारत कृषि वस्तुओं में सर्वाधिक निर्यात अनाज का करता है।
डैच् के माध्यम से खाद्यान्नों व अन्य फसलों के लिए बाजार में कीमत स्थिरता उत्पन्न हुई है।
उपर्युक्त के बावजूद भारत में डैच् की नीति को पूर्णरूप से निर्विवाद नहीं माना जा सकता।
डैच् के नकारात्मक प्रभाव
ऽ भारत में डैच् की नीति के संचालन से मोटे अनाज और दालों के उत्पादन पर विपरित प्रभाव पड़ा है। यह ध्यान देने योग्य है कि डैच् की नीति के साथ राजनीति का मिश्रण गेहू व चावल के पक्ष में जाता है।
ऽ भारत में डैच् का लाभ कुछ विशेष क्षेत्रों (जैसे कि पंजाब, हरियाणा आदि) और कुछ विशेष लोगों (जैसे की बड़े किसान आदि) को अधिक मिला है। इसके कारण प्रादेशिक विषमताओं के साथ आय की विषमता भी बढ़ी है यह समावेशी विकास के लक्ष्य के विपरित है।
ऽ डैच् की नीति के अनुसार सभी किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए यह जरूरी है कि थ्ब्प् द्वारा पर्याप्त मात्रा में च्तवबनतमउमदज बमदजमते (अधिग्रहण केन्द्र) खोले जायंे लेकिन सरकार द्वारा इस बिन्दू पर उचित ध्यान नहीं दिया गया, मण्डियों में कमीशन एजेण्टों को यह कार्य सौंपा गया। भारत में कमीशन एजेण्ट शोषणकारी होते हैं, इसके अलावा उनके द्वारा समय पर भुगतान नहीं किया जाता इससे किसानों की रूची कम हो जाती है।
ऽ डैच् से जुड़ी हुई भारतीय नीति में खाद्यान्नों को लेकर निर्धन लोगों के माँग पक्ष को ध्यान में नहीं रखा गया। निर्धन लोग मोटा अनाज अधिक पसन्द करते है लेकिन भारत में डैच् की सरकारी नीति इनके उत्पादन में कमी के लिए एक बड़ी सीमा तक उत्तरदायी मानी जा सकती है।
ऽ यह कहा गया कि थ्ब्प् द्वारा किए जाने वाले अधिग्रहण, भण्डारण आदि के कारण खाद्यान्नों के खुले बाजार पर विपरित प्रभाव पड़ता है। विश्व बैंक के अनुसार खाद्य सुरक्षा को दीर्घकाल के लिए सुनिश्चित करने में निजी बाजार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारत में डैच् की सरकारी नीति का उचित विवेकीणरण किया जाना चाहिए ताकि किसानों को पर्याप्त सुरक्षा मिल सके तथा अन्य लक्ष्यों की पूर्ति की जा सके।
च्नइसपब ेजवबाीवसकपदह व िविवक हतंपदे के मुद्दे पर ॅज्व् के स्तर पर भारत के प्रस्तावः-
वर्तमान में कृषि सब्सिडियों के स्तर को लेकर ॅज्व् में विकासशील और विकसित राष्ट्रों के मध्य विवाद बना हुआ है। इस सन्दर्भ में भारत ळ-33 समूह के माध्यम से इस मुद्दे के समाधान के लिए निम्न प्रस्ताव कर रहा है-
ऽ डैच् के माध्यम से दी जाने वाली साब्सडी को ळतममद इवग ेनइेपकल का दर्जा दिया जाये।
ऽ यदि लो इनकम और रिर्सोस-पूवर-फार्मर की आर्थिक सहायता करने के लिए ऊंची कीमतों पर अनाज खरीदा जाता है तो उसकी गणना ।डै के रूप में नहीं की जानी चाहिए अर्थात् उसे ।डै से बाहर रखा जाना चाहिए।
ऽ msp के आधार पर साब्सिडी की गणना करने के लिए म्त्च् ( म्गजमतदंस तममितमदबम चतपबम) के आधार वर्ष 1986-88 को बदला जाना चाहिए। और उसके स्थान पर किसी समकालिक वर्ष को आधार वर्ष के रूप में प्रयुक्त किया जाना चाहिए।
भारत के उपर्युक्त प्रस्तावों को लेकर विकसित राष्ट्र सहमत नहीं है।