सागर सी लहर 

पवन सा झोंका, 

तपन सूर्य सा 

अँधेरे को रोका, 

दूर उस गगन पर होके सवार। 

बह चला जीवन नदी के समान ।।


औरों की बातें 

कोयल की कूक, 

नशा जाम का और 

बाँसुरी की फूंक, 

आकंठ बेला और 

स्वयं का आकार, 

रुख यूँ मोड़ा जैसे 

उसका हो अधिकार, 

दूर उस गगन पर होके सवार। 

बह चला जीवन नदी के समान ।।


खुशबू बनारस की 

गंगा की धार, 

ओढ़ ली है रोशनी 

कोहरे की हार, 

ओस की ये बूँदें 

और सुनहरी बयार, 

कह रहा जैसे 

गीता का सार, 

दूर उस गगन पर होके सवार। 

बह चला जीवन नदी के समान ।।