भूरादि समस्त लोकों को आच्छादित कर सोया हुआ वृत्र नामक असुर जिसको इन्द्र ने मारा वह इन्द्र के द्वारा जब मारा गया तब उसके शरीर से दुर्गन्धयुक्त द्रव्य निकला। चूँकि वह विशालकाय था इतना विशाल कि तीनों लोकों को घेरने में समर्थ था इसलिए उसके मृत शरीर से निकलने वाला दुर्गन्ध युक्त द्रव्य भी अपार ही था। वह दुर्गन्ध युक्त द्रव्य पृथिवी के चारों ओर व्याप्त समुद्र के जलों की ओर बहने लगा। दुर्गन्ध द्रव्य युक्त जलों को अतिक्रमित कर पृथिवी की ओर बहने वाले जल ही शुद्ध बचे शेष समुद्र के समस्त जल दुर्गन्ध युक्त हो गए। उन शुद्ध जलों के पृथिवी से संयोग होने पर वे जल दर्भ (कुशा) रूप में परिवर्तित हो गए। ये दर्भ रूप में परिणत जल ही निश्चित रूप से शुद्ध हैं( समुद्रस्थ अन्य जलों की अशुद्धता स्वतः सिद्ध हो जाती है। यह यज्ञ पवित्र कर्म है] अपवित्र जल से इसका अनुष्ठान नहीं हो सकता] यही कारण है कि दो कुशपवित्र का छेदन कर उससे अन्य जलों की अपवित्रता को दूर करते हैं। इस प्रकार पवित्र जलों से ही अध्वर्यु प्रोक्षण करते हैं। इसलिए पवित्रीकरण /प्रोक्षण करते समय जल में कुशपवित्र डालकर उससे ही प्रोक्षण करने का विधान श्रुति में प्रतिपादित है।
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