समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित एक अवधारणा है ,जिसका अर्थ है भारत के नागरिकों के लिए सार्वजनिक आचरण का नियम धर्म की मान्यताओं से मुक्त होगें,और धार्मिक भेद‌भाव से परे होगी। इस प्रकर यह सार्वजनिक आचरण के नियम सर्वमान्य रूप से विकसित करने पर बल देता है। सार्वजनिक आचरण के अन्तर्गत विवाह, तलाक, भरण पोषण, उत्तराधिकार आदि विषय साम्मिलित किए जाते हैं। UCC केवल नागरिको के लिए है, यह नागरिकों को सभ्य बनाने एवं सभ्य समाज बनाने में सहायक है। यह समाज के प्रगतिशील चिंतन का प्रतीक है। यह समाज को बुराई से मुक्त होकर प्रगतिशील बनने (में) का अवसर देता है। यह उदारवादी चिंतन पर आधारित एक बौद्धिक दर्शन है जो समाज में समता एवं समरसता के बीज बोता है। 

विवाद.

 सर्वप्रथम अहमद खान बनाम शाह बानो के मामले में UCC की आवश्यकता सार्वजनिक सप रूप में प्रकट हुई। शाह बानो को पति ने तलाक के बाद भरण-पोषण देने से मना कर दिया। जब -यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125-128 के मध्य वार्णित प्रावधानों के अन्तर्गत भरण पोषण देने का आदेश जारी किया (जो सभी धर्मी पर समान रूप से लागू है।) तो संसद ने कानून बनाकर न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया और इस कानून के ऊपर इस्लाम धर्म के मान्यताओं को सरंक्षण प्रदान कर दिया। परिणामस्वरूप शाह बानो-यायालय के आदेश के बावजूद पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने में असफल रही। क्योंकि इस्लाम धर्म पति को तलाकशुदा को केवल 4 माह 10 दिन तक भरण पोषण करने का अधिकार देता है।

शाह बानो से लेकर शायरा बानो तक (2016) इस्लाम धर्म की महिलाएं इसी भेद‌भाव का शिकार होती रही है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रावधान भी महिलाओ के अधिकार का व्यापक हनन करते है। उदाहरणस्वरूप इस्लाम में बहु विवाह प्रथा प्रचलित है व कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है जबकि अन्य धर्मों में बहु‌विवाह प्रतिबंधित है। आईपीसी की धारा 494 एक से अधिक विवाह करने पर 7 वर्ष की सजा का प्रावधान करता है किन्तु यह प्रावधान इस्लाम धर्म के अनुयाईयों पर लागू नहीं होता साथ ही यह आजादी केवल पुरुषों को है, महिलाओ को नहीं इत्यादि ।.

→ सरला मुद्गल बनाम भारत संघ के मामले में SC ने सरकार से यह अपेक्षा की कि वह सिविल संहिता को लागू करने हेतु उचित कदम उठाए.

बधाएं 

निम्नलिखित बाधाओं ने U.C.C. को माने में चुनौती उत्पन्न की है-

① वर्तमान समय में सार्वजनिक आचरण के नियम धर्म के आधार पर शासित होते हैं। धर्म की मान्यताओ के प्रति लोगों में अचभाति है? अतः धर्म की सीमा से बाहर जाकर आचरण करने का व्यवहार उन्हें आन्दोलित करता है।

⑥ धर्म की व्याखया उदारवादी चिंतकों के बजाय प्रायः कट्टरपंथी चिन्तक करते है जो धर्म पर आधारित सुधारों का विरोध करते है, यही कारण है कि लोगों में भी यही भावना (विरोध करने की सुधारों के प्रति) विकसित होती है।

③ लोगों में सामाजिक जागरुकता का अभाव है। अतः वे सामाजिक हितों के उदार एवं प्रगतिशील व्याख्या का प्रायः विरोध करते हैं।

④ राजनीति समस्त सुधारों की जननी है किन्तु इसे लागू करने में स्वतंत्रता के बाद से ही राजनैतिक दलों में प्रतिबद्धता का अभाव रहा है।

⑤ राजनैतिक दलो ने वोट पाने को अपना एक मात्र लक्ष्य घोषित कर रखा है। अतः अनेक दल एवं नेता इस विचार का खुला विरोध करते हैं।

⑧ देश की सामाजिक, सांस्कृतिक विविधता संहिता के निर्माण में चुनौती उत्पन्न करती है।,

उपाय

① सभी धर्म के अनुयायियों एवं धार्मिक नेताओं को मिलाकर एक सार्वजनिक मंच बनाया जाना चाहिए जहां इस विषय पर खुली बहस कर किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके।

② लोगों के बीच यह जागरुकता विकसित किया जाय कि UCC धर्म विरोधी नहीं है, यह केवल सार्वजनिक आचरण करने में तार्किकता को बल देती है; धर्म आधारित व्यक्ति के व्यक्तिगत आचरण बने रहेंगे। समाज के संगठनों के माध्यम से यह जागरूकत विकसित की जानी चाहिए।

③ राजनैतिक दलों में सर्वसम्मति विकसित की जानी चाहिए और राजनेताओं को संकीर्ण दृष्टिकोण का त्याग करना चहिए।

④ कठोर राजनैतिक प्रतिबद्धता एवं निर्णय के प्रति दृढ इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन किया जाना चाहिए।

Note:- उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है।